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Media and perspective about genuine journalism.

जैसा की हम गूगल करने से यह पाते हैं कि देश में 400 के ऊपर satellite चैनेल्स हैं जिन्हे हम टीवी में देख सकते हैं और न जाने सैकड़ो youtube channels  भरे पड़े हैं लेकिन फिर भी एक सवाल आ खड़ा हुआ है

Journalism पत्रकारिता में पैसो की वैल्यू इनफार्मेशन से ज्यादा कैसे हो गयी?

मतलब अगर हम देखें कि मीडिया में सिर्फ ये पैसा है जो इनफार्मेशन को manipulate करके न्यूज़ बनता है. टीवी चैनल हो या टीवी चैनल हो या न्यूज़ पेपर वाले ये आज से नहीं अर्सो से परोस रहे हैं आपकी थाली में लेकिन पता नहीं था उस वक़्त इंटरनेट था नहीं और जो दिल करता जहाँ से जैसा माल मिलता उस हिसाब से न्यूज़ बना देते होंगे. वैसे ऐसा नहीं है की हर चैनल ऐसा करता होगा या हर अख़बार पेड न्यूज़ चलता होगा. गहराई में जाते हैं.

पहले तो न्यूज़ को बाँट लेते हैं

न्यूज़ तीन तरह से बांटी जा सकती  है
१. रीयल न्यूज  २. फेक न्यूज ३. मिलावटी न्यूज  4. Error

वैसे तो फेक न्यूज़ और मिलावटी न्यूज़ दोनों ही एक हैं क्योंकि झूठआधा हो या पूरा corrupt तो रियल न्यूज़ होता है लेकिन फिर भी कुछ लोग तो काफी स्मार्ट होते हैं. डिटेल से देखते हैं

1. रियल न्यूज  

रियल न्यूज़ में यह तो क्लियर केस है की कोई इंसिडेंट कहीं हुआ – कब हुआ कैसे हुआ क्यों हुआ उसकी पूरी रिसर्च होती है और स्वयं के रिपोर्टर्स के द्वारा बनायीं गयी हो या वह एक जेन्युइन सोर्स से हो. कुछ विदेशी देसी न्यूज़ एजेन्सी हैं जिनको बहुत माना जाता है रायटर्स, बीबीसी, ANI, आज तक, NDTV , फिर इंडिया टीवी  ज़ी न्यूज़ ABP और फिर लम्बी लाइन है) 

अब ये इशू नहीं रह गया यह है की किसको मानें किसको नहीं  क्योंकि आज कोई भी जेन्युइन न्यूज़ की चादर ओढ़ कर गड़बड़ कर सकता है पहले यह था की ये हमर चॅनेल है ये हमें पसंद है क्योंकि यह एकदम सच्ची  खबर दिखता है लेकिन सचाई तो ये है आज सभी पॉपुलर कंटेंट बनाना चाहते हैं कोई बोरिंग न्यूज़ नहीं दिखाना चाहता एक चॅनेल ने तो कई सेलिब्रिटी को ले कर विज्ञापन दिखाना शुरू कर दिया था 

बोरिंग न्यूज़ खल्लास अब न्यूज़ पाईये मस्का मार के – मसालेदार 

हद होती है… न्यूज़ को मसालेदार भी बनाया जा सकता है.. क्यों नहीं US  में तो कपडे उतार के तक न्यूज़ पढ़ी गयी है फिर इंडिया में कम से कम हॉट लड़की का थंबनेल लगा कर न्यूज़ वीडियो पर क्लिक तो करवाया ही जा सकता है। . और या फिर न्यूज़ वेबसाइट पर हॉट अडवेंचरस रिच टेक्नोलॉजी या पैसे कमाने के तरीको के विज्ञापन लगाना भी गलत नहीं हैं वे पोर्न थोड़े ही हैं बस थोड़ा सा 


रियल न्यूज़ क्या है कैसे रिपोर्ट की जाती है इसके बारे में आपको यूट्यूब में बहुत कंटेंट मिल जायेगा की पत्रकारिता कैसे सीखें बीसो कॉलेज हैं आज कल जो डिग्री कोर्स करवाते हैं यह ही नहीं आज कल तो टीवी वालों ने भी धंधा खोल रखा है 

पत्रकारिता के जगत में नाम कामना चाहते हैं तो हमसे इसके गुर सीखिए  हमारा चॅनेल आपको  सिखाएगा की कैसे ये कमाल हम करते हैं  ……. किताबों  में क्या रखा है डिग्री तो कोई भी देता है पर असली प्रैक्टिकल हम करवाते हैं स्टूडियो के सपने देखो  की  …… 

वैसे सही भी है जो बात आप स्टूडियो में रह के सीखेंगे वह प्रैक्टिकल आप कॉलेज की बराबरी कैसे करे। .. फिर भी ये पता नहीं की ये जो MASS Media journalism का कोर्स कितने में करवाते हैं मीडियाइंस्टीटूशन बिज़नेस क्या है …. शायद कोई दान पुण्य स्कीम हो जिसमें गरीब कल्याण का काम होता हो पता नहीं स्कॉलरशिप होगी 
(चेक मीडिया रैंकिंग)

२. फेक न्यूज 

देखिये फेक न्यूज़ के बारे में अगर आप गूगल करते हैं तो बहुत सारे लोगो ने पहल की है सरकार ने भी काफी कड़क कदम उठाएं हैं। … चल रहा है किन्तु बड़ी समस्या नीचे है 

३. मिलावटी न्यूज

परसेंटेज कैसे पता करेंगे रियल व फेक का। . क्योंकि मिलावट भी तो कोई चीज़ है इस पर अभी लिखना है 

फिर चॅनेल्स को बाँट लेते हैं

अगर हम चॅनेल्स को बाँट ले की कौन कितना फेकू काम करता है तो हमें फायर कर दिया जायेगा तो हम थोड़ा सावधानी से बात को बताएंगे इस बात को 
अगर आपको याद होगा कुछ दशकों पहले में जब हमारे देश के भारत वासियों को केबल टीवी से कई न्यूज़ चॅनेल आये तो हम कैसी न्यूज़ देखा करते थे –

पता नहीं इनको अभी तक पाताल का द्वार मिला या नहीं वैसे तो ये लिंक अभी २०१६ के हैं पर २००० से ये सब खूब चलता था आज भी है रोचक कहानी के कार्यक्रम और कई तो रियल स्टोरीज को भी मसाले दार तरीके से दिखा रहे हैं 
प्रैक्टिस करते हैं की रोमांच बना रहे.. सनसनाती हुई सनसनी न्यूज़ हो.. इसलिए आम  खबर को भी सनसनी बनाते हैं ताकि हमें पसंद आए.. पहले हमारा स्वाद कुछ और था आज थोड़ा बदल गया है तो बदलते वक़्त के साथ १०० खबर और बुलेट की तरह जाती है। भाई इंटरनेट स्पीड बढ़ गयी है देश काफी  विकास कर गया २ दशकों से और आज लगभग सभी चॅनेल १०० खबर दिखाते हैं.. क्योंकिं ये यूट्यूब का ज़माना है  बेचारे जो ज्यादा सनसनी करने में कमजोर थे जैसे NDTV वो भी दबे सहमें १०० खबर को टॉप न्यूज़  का नाम दे कर के दिखा रहे हैं। . नहीं आता है क्योंकि प्रैक्टिस नहीं है यह नॉनस्टॉप न्यूज़ की और अपनी इमेज की चिंता भी क्योंकि उनके न्यूज़ चॅनेल की पर्सनालिटी को यह स्टाइल शोभा नहीं देती शायद ऐसा वे मानते होंगे। तो बात प्रैक्टिस की है की हम क्या प्रैक्टिस कर रहे हैं – कैसे न्यूज़ पॉपुलर हो.. न्यूज़ को पॉपुलर कैसे बनाएं।।
प्रैक्टिस करते करते यह इस्थिति आ जाती है की चाहें तो भी किसिस को ना नहीं कर पाते हैं बड़े बड़े लोग पैसा ले कर खड़े रहते हैं की साहब आप तो मीडिया में हैं कुछ करवा दीजिये और भी बहुत कुछ होता होगा इसकी तो इनकम सोर्स लिस्ट ऑफ़ मीडिया चॅनेल्स बनायीं जा सकती है।
प्रैक्टिस का एक और उदहारण आप देखेंगे जब कोई बड़ी  personality  की मौत होती है तो ये अपना वही राग अलापने लगते हैं 

    देखिये इनका जन्म कितने गरीब परिवार में हो कर संघर्ष का जीवन और कठिनाइयों से भरी जिंदिगी। … 

काफी दुख है इनको। …. मृतक का तमाशा और होड़ की जल्दी कोई दूसरा बड़ा आदमी अपनी प्रतिक्रिया दे दे। . अपने रिपोर्टरो को सेलेब्रिटीज़ के घरो के आगे पीछे लगा दो कोई भी कमेंट मिल जाये तो बात बनजाये। ढमक ढमक बजने वाले २ मिन की शांति का मोल नहीं समझ पा रहे होते हैं।  फिर बजते बजाते थक जाते हैं तो कोई दूसरी खबर चला देते हैं. प्रैक्टिस – 
अच्छी प्रैक्टिस हो गयी है

 
कोरोना काल में तो मीडिया की बल्ले बल्ले ! जैसे किसी को उम्मीद हो किसी को पेट्रोल मिल जाये आग लगाने के लिए पर यहाँ तो अनलिमिटेड तेल का कुआँ मिल गया जिसका पता ही नहीं की तेल कब ख़तम होगा। कोरोना ऐसी निकला की आदमी घर पर टीवी देखने के लिए मजबूर हो गया. फिर हमें काम तो वही करना है जिसकी हमने प्रैक्टिस की है – काटो 
मतलब ये की जो मारा भी न हो उसकी न्यूज़ भी ऐसे दिखानी है की बस आधी श्रृद्धांजलि तो अभी ही दे दो बाकी की मरने के बाद.. तब तब तो लोग भी पगला जाएंगे। .. इस देश में न्यूज़ की कमी थोड़े ही है किसी भी आम आदमी को पकड़ो और उसके मुँह में माइक डाल के बोल दो- ” कैसा लग रहा है आपको?  फलाने की मौत पर आपका क्या कहना है?” 
लिस्ट ऑफ़ सेलेब्रिटीज़ डाइड इन २०२०
फिर प्रैक्टिस करते करते साल बीत जाता है और अवार्ड मिलने लगते हैं और हम अपने ही चॅनेल में दिन रात घिसते  रहते हैं की देखो हम नं 1 हैं…. हम नं 1 हैं हमसे तेज़ मसालेदार जोरदार प्रैक्टिस करने वाला कोई नहीं दूर दूर तक और हम इस प्रैक्टिस का शोर इतना ज्यादा करते  हैं की हमें खुद ही चीख चीख कर बताना पड़ता है.. की हमे ये पुरुस्कार मिला है अगर हम आज तक जेन्युइन जर्नलिज्म पर जोर डालते तो शायद बाजू वाला चॅनेल हमारे अवार्ड्स और हम उनके अवार्ड्स का बखान कर रहे होते। .. लेकिन ऐसा नहीं होता 
होड़ लगी है  
Perspective पर्सपेक्टिव (परिपेक्ष्य) न्यूज़ हमे आजादी देता है की किस बात पर या किसी समाचार पर हमारा क्या पर्सपेक्टिव है हमें ऐसा लगता है इसलिए ये सही है और हम दिखा रहे हैं 
किसी एक न्यूज़ के दो पक्ष बना कर देखें तो न्यूज़ एंकर का अभिनय दिखने लगता है आपको अलग अलग चॅनेल पर पक्ष और विपक्ष दोनों दिख जाएंगे कई बार आप अपने प्रिय चॅनेल को गलत करता देख भी ये ढूढेंगे की इन्होने ऐसा किया है तो जरूर कोई बात होगी। . या फिर विपक्षी चॅनेल भी कभी सही हो जाये और हमारे प्रिय चॅनेल से भी थोड़ी बहुत गलती हो सकती है। .. हम अपने प्रिय चॅनेल को स्पेस देते हैं की कोई नहीं कोई परफेक्ट नहीं होता और हमें भी मनोरंजन की जरूरत है 

परसेंटेज कैसे पता करेंगे रियल व फेक का। . क्योंकि मिलावट भी तो कोई चीज़ है

जिम्मेदारी किसकी ?

क्या जरूरत है इतना सब सोचने की की कहाँ जा रहा है ये इंटरनेट और कहाँ जा रहे हैं हम!

to be continued..